समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में दीप्ति खंडेलवाल: मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व और शिल्पगत विशिष्टताओं का विस्तृत अनुशीलन
DOI:
https://doi.org10.5281/zenodo.21891818Keywords:
दीप्ति खंडेलवाल, स्त्री-अस्मिता, स्त्री-विमर्श, देह-विमर्श, दांपत्य जीवन, मध्यवर्गीय संत्रास, सामाजिक यथार्थAbstract
प्रस्तुत अध्ययन समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की प्रमुख कथाकार दीप्ति खंडेलवाल के कथा-साहित्य में अभिव्यक्त मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व, सामाजिक यथार्थ तथा शिल्पगत विशिष्टताओं का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। उनकी कहानियों में भारतीय मध्यवर्गीय एवं उच्च-मध्यवर्गीय समाज की आर्थिक विवशताओं, पारिवारिक तनावों, दांपत्य जीवन के विघटन, स्त्री-अस्मिता, यौन-कुंठा, अकेलेपन तथा मानवीय संबंधों में उत्पन्न दूरी का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है। विशेष रूप से ‘क्षितिज’, ‘प्यार’, ‘वह तीसरा’ और ‘रीतते हुए’ जैसी रचनाओं में दांपत्य संबंधों में अहं, बौद्धिकता और उपयोगितावादी दृष्टिकोण से उत्पन्न अलगाव को रेखांकित किया गया है। अध्ययन में स्त्री की काम-चेतना, देह-विमर्श और सामाजिक नैतिकता के अंतर्द्वंद्व को भी प्रमुखता दी गई है। ‘युगपुत्री’, ‘देह की सीता’, ‘हव्वा’ और ‘अर्थ’ जैसी रचनाओं के माध्यम से स्त्री की इच्छाओं, दमन, सामाजिक मर्यादाओं तथा आत्म-अस्तित्व के संघर्ष को उद्घाटित किया गया है। साथ ही ‘भूख’, ‘जहर’, ‘युद्धरत’ और ‘सलीब पर’ जैसी कहानियों में आर्थिक अभाव, बेरोजगारी, गरीबी तथा पूंजी-केंद्रित सामाजिक व्यवस्था के कारण मानवीय मूल्यों के क्षरण को अभिव्यक्ति मिली है। दीप्ति खंडेलवाल के कथा-साहित्य में बाह्य द्वंद्व और आंतरिक मनोद्वंद्व दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। सामाजिक रूढ़ियों, पारिवारिक दबावों और राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न बाह्य संघर्ष के साथ-साथ अहं, हीन भावना, त्याग, असुरक्षा और अस्तित्व-संकट से उत्पन्न आंतरिक संघर्ष भी उनके पात्रों के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। शिल्प की दृष्टि से उनकी कहानियों में वर्णनात्मक, संवादात्मक, आत्मकथात्मक, व्यंग्यात्मक, पूर्वदीप्ति तथा काव्यात्मक शैलियों का प्रयोग मिलता है। उनके कथा-शीर्षक भी प्रतीकात्मक एवं अर्थपूर्ण हैं। समग्रतः दीप्ति खंडेलवाल का कथा-साहित्य स्त्री-अस्मिता, मनोवैज्ञानिक यथार्थ, मध्यवर्गीय संत्रास और सामाजिक विसंगतियों का सशक्त चित्र प्रस्तुत करता है। उनकी रचनाएँ स्त्री को केवल पीड़ित या आदर्श पात्र के रूप में नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, कमजोरियों, संघर्षों और स्वतंत्र अस्तित्व के साथ एक वास्तविक मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती हैं।Downloads 28 and Views 0
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Copyright (c) 2026, रजनीश वर्मा,डॉ. रश्मि चौहान
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